हमारे समाज में, खास तौर पर उत्तर भारतीय परिवारों में, बड़े बेटे का जन्म सिर्फ एक बच्चे का आना नहीं होता, बल्कि एक ‘उत्तराधिकारी’ का आगमन होता है। वो उत्तराधिकारी जिसे विरासत में ज़मीन-जायदाद मिले या न मिले, घर की सारी चिंताएं और जिम्मेदारियां पहले दिन ही सौंप दी जाती हैं।
एक अनकहा दबाव: “तुम अब बड़े हो गए हो”
घर का ‘बड़ा बेटा’: जिम्मेदारी या बोझ – बड़े बेटे के जीवन में एक मोड़ ऐसा आता है जब उसके खिलौने छीनकर उसे छोटे भाई-बहनों की उंगली थमा दी जाती है। उसे बार-बार याद दिलाया जाता है— “तुम बड़े हो, तुम्हें ही सबको संभालना है।”
एक रीयल लाइफ सिचुएशन (1): कल्पना कीजिए 22 साल के राहुल की, जिसका सपना था कि वह शहर जाकर म्यूजिक सीखे या किसी स्टार्टअप पर काम करे। लेकिन अचानक पिता बीमार हो जाते हैं या रिटायरमेंट करीब आता है। राहुल बिना कुछ कहे अपना गिटार अलमारी में बंद करता है और उसी दिन पास की किसी कंपनी में ऐसी नौकरी ज्वाइन कर लेता है जिसे वो नफरत करता है, सिर्फ इसलिए ताकि छोटे भाई की इंजीनियरिंग की फीस न रुके। यह राहुल की कहानी नहीं, हर दूसरे घर की दास्ताँ है।
बड़े बेटे का नजरिया: “मैं गिर नहीं सकता”
घर के बड़े बेटे के लिए सबसे बड़ी सजा यह है कि उसे ‘रोने’ या ‘थकने’ की इजाज़त नहीं होती। उसे घर का सबसे मजबूत स्तंभ (Pillar) माना जाता है।घर का बड़ा बेटा जिम्मेदारी या बोझ यह तय करेंगे नीचे के कुछ बिंदु
- वह अपनी ख्वाहिशों का गला घोंटना सीख जाता है।
- वह अपनी सैलरी का 80% घर भेजता है और खुद फटी हुई बनियान या पुराने जूतों में महीना काट देता है।
- उसे डर लगता है कि अगर वह एक दिन भी कमज़ोर पड़ा, तो पूरा परिवार ढह जाएगा।
उसके मन में एक टीस होती है— “क्या कभी कोई मुझसे भी पूछेगा कि मुझे क्या चाहिए?”
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परिवार का नजरिया: “वो तो है ही संभालने के लिए”
दूसरी तरफ परिवार की भी अपनी उम्मीदें हैं। माँ-बाप को लगता है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन संघर्ष में बिताया, अब बड़े बेटे का फर्ज है कि वह उन्हें आराम दे। छोटे भाई-बहनों के लिए बड़ा भाई एक ‘एटीएम’ या ‘संकटमोचक’ बन जाता है। उन्हें लगने लगता है कि भैया की तो लाइफ सेट है, उन्हें तो कोई समस्या हो ही नहीं सकती। अक्सर परिवार अनजाने में उसकी भावनाओं को “उसका कर्तव्य” मानकर उसे ग्रांटेड (Granted) लेने लगता है।

एक रीयल लाइफ सिचुएशन (2): घर में बहन की शादी तय होती है। सारा बजट, सारी भागदौड़, सारे लोन की किस्तें बड़े भाई के नाम होती हैं। शादी के दिन सब खुश होते हैं, लेकिन किसी की नज़र उस बड़े भाई पर नहीं जाती जो कोने में खड़ा होकर हलवाई का हिसाब कर रहा है और यह सोच रहा है कि अगले महीने की किस्त कैसे जाएगी।
बड़े बेटों के लिए: इस ‘भारी मुकुट’ को कैसे संभालें?
अगर आप घर के बड़े बेटे हैं और इस बोझ तले दब रहे हैं, तो कुछ बातें गांठ बांध लें:
- संवाद (Communication) करें: चुपचाप घुटने से बेहतर है कि आप अपने माता-पिता और भाई-बहनों के साथ बैठकर बात करें। उन्हें अपनी सीमाओं (Boundaries) के बारे में बताएं। उन्हें बताएं कि आप एक इंसान हैं, सुपरमैन नहीं।
- छोटे भाई-बहनों को आत्मनिर्भर बनाएं: उन्हें सब कुछ थाली में सजाकर देने के बजाय, उन्हें भी जिम्मेदारियों में शामिल करें। अगर आप उन्हें ‘पंगु’ बना देंगे, तो आप कभी आज़ाद नहीं हो पाएंगे।
- अपने लिए भी थोड़ा जिएं: अपनी सैलरी का एक छोटा हिस्सा अपनी खुशियों या हॉबी के लिए बचाएं। अगर आप अंदर से खुश नहीं रहेंगे, तो परिवार को लंबे समय तक सहारा नहीं दे पाएंगे।
परिवार के लिए: आप क्या कर सकते हैं?
परिवार का भी यह फर्ज़ है कि वह बड़े बेटे को सिर्फ एक ‘अर्निंग मशीन’ न समझे:
- उससे पूछें: हफ्ते में एक बार उसे गले लगाकर बस इतना पूछें, “बेटा, तू कैसा है? तुझे किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं?” यह एक वाक्य उसे इतना सुकून देगा जितना कोई दौलत नहीं दे सकती।
- उसकी कुर्बानी को पहचानें: उसे एहसास कराएं कि आप उसकी मेहनत को देख रहे हैं। उसकी छोटी-छोटी सफलताओं का जश्न मनाएं।
- तुलना न करें: कभी भी उसकी तुलना पड़ोस के ज्यादा कमाने वाले लड़के से न करें। याद रखें, उसने घर के लिए वह सब छोड़ा है जो शायद दूसरे ने नहीं छोड़ा।
निष्कर्ष
बड़ा बेटा होना एक गर्व की बात है, लेकिन यह किसी की पहचान का अंत नहीं होना चाहिए। एक मज़बूत परिवार वही है जहाँ बड़े भाई के कंधे इतने मज़बूत हों कि वह सबका भार उठा सके, लेकिन परिवार का दिल इतना बड़ा हो कि वह उस भाई को कभी अकेला महसूस न होने दे।
अगर आप भी किसी ऐसे ‘बड़े बेटे’ को जानते हैं, तो उसे यह लेख ज़रूर भेजें। शायद उसे लगे कि दुनिया में कोई तो है जो उसका हाल जानता है।
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